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Showing posts from June, 2024

गजल

किसने चाहा था कि वो केवल यहां जिंदा रहे, हाथ फैलाए, गिरे घुटनों पे और शर्मिंदा रहे। शुतुरमुर्गों ने सिर घुसाया धूर्तता की रेत में, उनको क्या चिंता कि हम मर जाएं या जिंदा रहें। सत्य चीखा और चिल्लाया मगर चुप हो गया नारे लगाने वाले उसकी लाश पर जिंदा रहे । त्याग और उत्सर्ग की गूंजी ऋचाएं थी जहां, अब वहां सिद्धांत केवल कागज़ी जिंदा रहे । अब नहीं कोई मसीहा आने वाला है यहां, आत्माएं मर गई सब जिस्म ही जिंदा रहे ।                                                    - सुधीर

पाथेय

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कामना के लोभ में, भगवान बदलते रहे । बदलाव खुद में न किया, आराध्य बदलते रहे। तम को प्रियतम बना, हमने बुझाए दीप सब । पथ में लक्ष्य भूलकर,   बस अनवरत चलते रहे। आवागमन के चक्र में, विराम न मिल पाएगा। यह अभी प्रारंभ है, क्या अंत कभी आएगा ? बंधनों से मुक्ति ही, जिसने बनाया ध्येय है। उसके लिए तो श्रद्धा ही, इस मार्ग का पाथेय है ।  - सुधीर    शांतिकुंज

पर्यावरण दिवस 5 जून 2024

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जब जायेंगे हम इस धरा से  सब धरा रह जायेगा, केवल हमारे दोष - गुण का  स्मरण रह जायेगा। शेष जीवन का नियोजन  शुभ सुफल निश्चित करेगा, धन्य  होगा उसका जीवन  सन्मार्ग जो अपनाएगा । अनुदान धरती से मिला जग अनुमान क्या कर पाएगा । इस धरा-शोषण का ये   दुष्चक्र न चल पाएगा । मानव जगत इस भूमि से तब ही उऋण हो पाएगा। जन जन करेगा वृक्षारोपण, हर आंगन हरा हो जायेगा ।

नींद में सोया बच्चा

कौन है झूठा कौन यहां पर सच्चा है, इसीलिए खुद से ही मिलना अच्छा है, सब उलझे हैं रंग बिरंगी दुनिया में, अपना दिल तो नींद में सोया बच्चा है, वो खुश हैं, वो सब चालों से वाकिफ हैं, आज ज़माना  उनके ही मनमाफिक है, कल क्या होगा इसकी उनको ख़बर नहीं, धोखा देने वाला मन का कच्चा है । आज जो पद या पदवी तुम्हें रिझाती है, कल वो किसी और की भी, हो जाती है, मत भूलो दो चार दिनों की खुशियां हैं, विजय होगा वही जो मन से सच्चा है ।