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Showing posts from October, 2019

तेरा ही नूर नज़र आता है

सच कहूँ हर चेहरे पर तेरा ही नूर नज़र आता है, मंदिरो मस्जिदों से पर  तू बड़ा दूर नज़र आता है | लड़ तो लेता है जमाने से वो हिम्मत बांधकर , खुद से हो सामना तो वो मजबूर नज़र आता है | जिसने पायी है शोहरत  दुनिया से छलावा करके, न जाने क्यूँ वही  मशहूर नज़र आता है | जब झूठ पर रंगत चढ़ा देती है दुनिया सच की , ज़िंदा रहने का यही दस्तूर नज़र आता है | कई जन्मों तक नहीं छोड़ेगी वो दामन  उसका जिसके माथे पर सज़ा सिंदूर नज़र आता है |  जिसके होठों  से हंसी झरती है हरसिंगारों  सी, उसके अंदर भी कोई नासूर नज़र आता है | वो जो कहता था कि होगी जीत अंतिम सत्य की, उसकी बातों मे मुझे कोई फितूर नज़र आता है | आज सुबह जो बढ़ा था घन तिमिर को रौंद कर सूर्य भी अब  श्रम से थककर चूर नज़र आता  है | कल तलक सिमटा जो रहता था लिबास-ऐ-शर्म में आज वो महफिल में तेरी  भरपूर नज़र आता है | -सुधीर -१२ अक्टूबर 2019!

क्षणिकाएँ

कच्ची मिटटी के मनुज आंवे सा संसार | केवल वाह्य प्रसन्नता  अन्दर है आकाश || निज हित साधन ही रहा जिनका प्राथमिक कर्त्तव्य | उनकी बुद्धि से परे  जीवन का मंतव्य || जो शिश्नोदर ही रहे निज लाभ हानि में व्यस्त | उनका जीवन बन गया निःसार, निरर्थक, त्रस्त || दो पहलु एक बात के पर उनका अंतर जान | शिक्षा देती सूचना  विद्या देती ज्ञान || भोजपत्र पर वेद ऋचा सा अंकित है गुरुज्ञान | धारण करने से मिटे  जीवन का अज्ञान || कमल पत्र पर ओस बिंदु सा  मन अस्थिर गतिमान | गुरुचरणों के ध्यान से हो अविचल, अटल, महान || -सुधीर 11 Oct. 2019

आस्था पर मूढ़ता के रंग

आस्था पर मूढ़ता के रंग अब चढ़ने लगे हैं , धर्मभीरु बन के हम अभिनय बहुत करने लगे हैं । दर्पणों से झांकते प्रतिबिम्ब मिथ्या बोलते हैं, किरदार पीछे जो छिपे क्या उसकी परतें खोलते हैं ? स्नेह के सम्बन्ध में अनुबंध की शर्तें जुड़ी हैं, त्याग को भी लोग अब, धन की तुला पर तोलते हैं । सत्य के मानक सभी सत्संग में ही दीखते हैं, मात्र सुनते हैं सभी,कब इससे कुछ भी सीखते हैं । सत्य के ग्राहक बहुत हैं शब्दों के व्यापार मेंं, पर सत्य कर बाँधे खड़ा है झूठ के संसार में, लख चौरासी को यहाँ अब मार्ग नूतन मिल गया है, आदमी की सोच में पशुता का लक्षण घुल गया है। कलयुगी कोहरे घने संसार पर अब छा रहे हैं, मूर्छित देवत्व है, दानव प्रभाती गा रहे हैं । डोर इतनी भी नहीं उलझी कि खुल ना पायेगी, बात इतनी भी नहीं बिगड़ी की बन ना पायेगी, छोड़ कर अवसाद, क्रन्दन, कर्म कुछ करना पड़ेगा, साधना के शौर्य से इतिहास नव गढ़ना पड़ेगा। देवता के दूत हम, शुभकर्म में निशदिन लगेंगे, राह जो गुरु ने दिखाई, दृढ़ कदम उस पर चलेंगे। -सुधीर भारद्वाज