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Showing posts from November, 2020

नयी कोई शुरुआत करते हैं

चलो हम फिर नयी कोई सुखद शुरुआत करते हैं , धारण मौन का करके स्वयं से बात करते हैं | पौ अब फट चुकी देखो वो सूरज भी निकल आया, विदा निद्रा से लेकर के नया कुछ काम करते हैं | नहीं किंचित भी बांकी है  भयंकर रात का अब भय, बुझे दीपक- छुपे जुगनू , उजाले याद करते हैं | कोई रूठा, कोई छूटा, कोई लौटा न फिर जाकर, अकेले इस सफ़र पर हम पुनः प्रस्थान करते हैं | नहीं पदचिन्हों पर दृष्टि, न आश्रित मानचित्रों पर, नया रस्ता-नयी मंजिल, स्वयं निर्माण करते हैं | बहुत तूफ़ान आयेंगे, बड़ी लहरें सुनामी की, भरोसा है भुजाओं पर, इन्हें  पतवार करते हैं | बनेंगे क्या यहाँ पर हम, लिखा क्या भाग्यरेखा में, रहेंगे कर्म में कर्मठ, नहीं परवाह करते हैं | मिलेगा क्या यहाँ हमको, कोई धनलाभ, पद भारी, विकट हैं  खेल माया के, हमें बर्बाद करते हैं | सजल-श्रद्धा, प्रखर-प्रज्ञा, हमारे मार्गदर्शक हैं, मिलें हर जन्म में हमको यही फरियाद करते हैं |                                             - सुधीर भारद्वाज 

वक़्त है तरुणाई का

अब नयी करवट है बदली, वक़्त है तरुणाई का, छोड़कर तन्द्रा-प्रमादी, सुबह की अरुणाई का, खेल पूरा हो चूका अब मलिन-मन परपीड़कों का, हम न किंचित हों विलंबित, अब समय भरपाई का | अब निवेदन का नहीं है, अब समय धिक्कार का, आस्था-आदित्य पर छाये हुए खग्रास का, उलटे पासे पड़ गए, न  उनको  अब कुछ सूझता, काल भी विकराल है, बीता समय नर्माई का | उनके चेहरों पर लगा था  रंग-ओ-रोगन द्रोह का  एक क्षण में बह गया, जो रंग था विद्रोह का    पाप का संताप अब मलिन मुख पर दीखता है, बोझ भारी है बहुत जीवन में इस रुसवाई का |

एक निवेदन भक्तजनों से

जिनका लहू लवण से हीन ,उनका मनोबल  दुर्बल-दीन, कालनेमि से करो न यारी , महाकाल सब लेगा छीन | आदर्शों का महिमा-मंडन, वाणी मात्र शब्दों का नर्तन , सूत्रपात में षडयंत्रों के , नेपथ्य भूमिका थी संगीन | जीवन खपा दिया क्या पाया? जो अपना था हुआ पराया, साथी सब बिछड़े राहों में, जैसे ढाक के पत्ते तीन | यदि कुचक्र को न अपनाते, नयी राह तुम फिर पा जाते, कोई दोष तुम्हे न देता , तुम न रहते यूँ  ग़मगीन | अब भाई इतना ही करना, मिला जो अपयश, उसको सहना , कुटिल चाल सब छोड़-छाड़ के, प्रायश्चित में रहना लीन| - सुधीर भारद्वाज 

जैसी करनी वैसा फल - आज नहीं तो निश्चय ही कल

तुमने नज़र   जहाँ भी डाली, दृष्टि तुम्हारी काली काली, पल्ले नहीं पड़ा कुछ भी जब , हाथ रह गया बिल्कुल खाली ।   था ये मिशन कष्ट से आकुल  , मौन तुम्हारा , भावहीन मुख , परिजन थे पीड़ा से व्याकुल, नाच रहे तुम दे-दे ताली ।   ऐसी भी क्या थी मजबूरी, मुख में राम बगल में छूरी, हमने समझा कंक ड़   होगा , दाल निकल गयी पूरी काली |   मन में छुपा हुआ घमंड था, क्रोध तुम्हारा अति प्रचंड था, आने वाली संतति पूछे , क्यों छेदी अपनी ही थाली ?   बाहर से थे उत्कट तापस, अन्दर से थे कृष्ण अमावास , टूट गया सब, छूट गया सब, जीवन बना रहा जंजाली |   पर उपदेश कुशल बहुतेरे, बगुला भगत मित्र थे मेरे, बा ड़ खा गयी खेत को खुद ही, जिसको करनी थी रखवाली |   गुरु ने कुंदन जैसा तपाया, माता ने हर क्षण दुलराया, खुद ही निज उपवन उजाड़कर, दीवाना सा फिरता माली |   यदि  शत्रु   कोई आ जाये, काल बनें, उस पर छा जायें, भितरघात तो घृणित  बहुत  है, है यह चाल दुश्मनों वाली |   तुमने अपना मार्ग न...