कुछ देखा कुछ अनदेखा
इस दुनिया में इन आखों ने, क्या क्या मंजर देखा है, अन्न उगाने वालों को भी, भूखों मरते देखा है । न जाने क्या राज छुपा है, झूठ का पलड़ा भारी है, झूठों के झुण्डों से अक्सर, सच को डरते देखा है । ओ!पानी के पहरेदारों आग लगी है बस्ती में, तुमको हमने तरणताल में, जलक्रीड़ा करते देखा है । जिनकी नेकदिली के किस्से, गूंज रहे अखबारों में, उनकी आस्तीन में हमने, सांपों को पलते देखा है । जिन राहों में धनवानों के, शव पर फूल बरसते हैं, उसी राह में कुछ लोगों को कांटों पर चलते देखा है । - सुधीर 5 जुलाई 2024