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संगठन की सद्गति

*संगठन की सद्गति* वर्तमान में किसी भी प्रकार का कोई संगठन चाहे वो राजनैतिक हो अथवा सामाजिक लोगों में एक नई उम्मीद जगाने में सफल होने के बावजूद कुछ कारणों से कुछ समय में ही अप्रासंगिक हो जाता है, उस संगठन के अनुयायियों का यह अप्रत्याशित मोहभंग इस अर्थ में बहुत घातक सिद्ध होता है कि समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग किसी भी नए अथवा प्रगतिशील प्रयासों को शंका की दृष्टि से देखने लगता है ।  ज्यादातर ऐसे संगठनों में केंद्रीय धुरी की भूमिका निभा रहे आत्मप्रशंसा प्रिय व्यक्ति प्रायः ऐसे लोगों के घेरे में ही अपने आप को सुरक्षित समझते हैं जो स्वयं के मन की मूल भावनाओं और अभिमत को अपने मन में ही दबा कर अपनी वाणी और विचारों में उन्ही शब्दों को स्थान देते हैं जो संगठन का मुखड़ा बने हुए व्यक्तियों को प्रीतिकर अनुभव होते हैं, यह कालांतर में उनके स्वभाव का एक स्थाई संस्कार बन जाता है जो उन्हें एक वृत्त में चहलकदमी कर रहे कृपापात्रों की पंक्ति में लाभकारी स्थान प्रदान करता है जिसमें ना तो कोई सर्वश्री होता है और ना ही कोई तदुपरांत ।  इस गणित को दुनियादारी की दृष्टि से समझने और अपनाने वाले व्यक्तियों ...