Posts

Showing posts from October, 2020

फूल मुस्काते हैं जब तुम मुस्कराते हो

 फूल मुस्काते हैं जब तुम मुस्कराते हो फूल मुस्काते हैं जब तुम मुस्कराते हो | गंध के इस छंद में तुम गुनगुनाते हो || रूप रचना भिन्न है पर एक सबकी प्रेरणा , गंध सबकी है अलग पर एक सबकी मंत्रणा | भूमि सबकी है अलग पर पोषण सभी का एक सा , विविध रंगों की छटा पर एक सा अंतस बसा || फूल ! ये सन्देश तुम सबको सुनाते हो | गंध के इस छंद में तुम गुनगुनाते हो || देव चरणों में रखें या गूंथ दे जयमाल में , पिरो दें वेणी में इनको या कि उन्नत भाल में | है सफल जीवन इन्हीं का सिद्ध इनकी साधना , जो मिला जीवन में उसको लोकहित में बाँटना || जीवन सुवासित है गुंणों से सत्य ये बतलाते हो | फूल मुस्काते हैं जब तुम मुस्कराते हो | कंटकों के मध्य भी मृदु हास्य बिखराते हैं ये , दिनमान नव फिर आ गया सन्देश पहुंचाते हैं ये | मंद मुस्कानों में खिलती इनके ह्रदय की भावना , सब सुखी हों, सब प्रफुल्लित, इनकी सदा है कामना || विश्वास के रूपक तुम्ही श्रद्धा जगाते हो | गंध के इस छंद में तुम गुनगुनाते हो || साथ इनका हो सदा सौभाग्य की ये बात है , कण मुदित है क्षण मुदित, जीवन मुदित हर साँस है | 'स्वर्ग से सुन्दर धरा' मिथ्या नहीं ये...

इन्सा अब मजबूर हो गया

 इन्सा अब मजबूर हो गया, थक के गम से चूर हो गया | खोजे उसने अमित लोक पर, खुद से कितना दूर हो गया || जाने कितने दीप जलाये, घर, देहरी और द्वार सजाये | बाहर का अँधियारा भागा, अंतर्मन बेनूर हो गया || रूप बनाया बहुत सजीला, अंतस हो ना सका चमकीला | काया कंचन सी निखरी पर, अन्दर से लंगूर हो गया || शब्द मंच तक ही हैं सीमित , हुआ ना उन से कभी लोकहित | पोथी की बातें रट-रट के, तोतों सा मशहूर हो गया || मुर्गे ने जब बांग लगाई समझा मैंने सुबह बुलाई | प्राची से जब निकला सूरज  अहंकार तब चूर हो गया ||