पाथेय



कामना के लोभ में,
भगवान बदलते रहे ।
बदलाव खुद में न किया,
आराध्य बदलते रहे।
तम को प्रियतम बना,
हमने बुझाए दीप सब ।
पथ में लक्ष्य भूलकर,  
बस अनवरत चलते रहे।
आवागमन के चक्र में,
विराम न मिल पाएगा।
यह अभी प्रारंभ है,
क्या अंत कभी आएगा ?
बंधनों से मुक्ति ही,
जिसने बनाया ध्येय है।
उसके लिए तो श्रद्धा ही,
इस मार्ग का पाथेय है ।
 - सुधीर
   शांतिकुंज

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