श्रद्धा: *विचार* नहीं *व्यवहार*
*श्रद्धा* है नहीं अभ्यासवश चरणों में झुक जाना,
*श्रद्धा* है नहीं पोथी की बातें रटके दुहराना,
*श्रद्धा* संगिनी है कर्म की मिलकर मुदित होती,
*श्रद्धा* व्यावहारिक सूत्र है खुद करके दिखलाना।
*श्रद्धा* साधकों को कर्म में तल्लीन करती है,
*श्रद्धा* साधकों के भाव भी शालीन करती है,
*श्रद्धा* है नहीं षड्कर्म, मंत्रों में उलझ जाना,
*श्रद्धा* है प्रतीकों से ककहरा हमको सिखलाना ।
*श्रद्धा* रूप लेकर *कर्म* का साकार होती है,
*श्रद्धा* संतुलन में *वाणी* का आधार होती है, es
*अंतःकरण* की शुद्धि का ही नाम है *श्रद्धा*
चुनकर सदगुणों से नीड़ का निर्माण है *श्रद्धा*
*श्रद्धा* है नहीं गणवेष और विन्यास आधारित,
*श्रद्धा* रक्त की हर बूंद में होती है संचारित,
*श्रद्धा* आत्मा-परमात्मा का योग है करती,
*श्रद्धा* मन,वचन और कर्म का संयोग है करती ।
*श्रद्धा* हो गहन पाषाण को प्रतिमा बनाती है,
*श्रद्धा* एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाती है,
*श्रद्धा* काली बन ठाकुर को आँचल में सुलाती है,
*श्रद्धा* औषधि बन मन के रोगों को मिटाती है,
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