नव वर्ष
अब रोना धोना बंद करो,
अवसादों का अवसान करो,
आने वाला है वर्ष नया,
कुछ नए लक्ष्य संघान करो ।
ये आराम थकन की बातें तो,
अच्छी लगती कुछ समय मगर,
ये जीवन है चलते जाना,
पिछड़ेंगे रुक गए अगर ।
मृग मरीचिका आयेंगी,
मन को भी भटकाएंगी,
तुम मत आना उस झांसे में,
वो कसमें दे समझाएंगी ।
अपने विवेक की बांह पकड़,
जो आगे बढ़ता जाएगा,
हो लक्ष्य भले दुष्कर कितना,
निश्चित पूरा हो जाएगा ।
जो गुजर चुके इन राहों से,
उनका इतिहास पुराना है,
अपना तो है लक्ष्य यही,
खुद का इतिहास रचाना है ।
हम उस माटी के वंशज हैं,
जिसमें जनमें हैं कर्मवीर,
जो सत्यमार्ग से डिगे नहीं,
तब ही कहलाये धर्मवीर ।
कहता सुधीर, न बनो अधीर,
जो होगा देखा जाएगा,
है कृष्णपक्ष जाना निश्चित,
तब शुक्ल पक्ष फिर आएगा ।
- सुधीर भारद्वाज
अवसादों का अवसान करो,
आने वाला है वर्ष नया,
कुछ नए लक्ष्य संघान करो ।
ये आराम थकन की बातें तो,
अच्छी लगती कुछ समय मगर,
ये जीवन है चलते जाना,
पिछड़ेंगे रुक गए अगर ।
मृग मरीचिका आयेंगी,
मन को भी भटकाएंगी,
तुम मत आना उस झांसे में,
वो कसमें दे समझाएंगी ।
अपने विवेक की बांह पकड़,
जो आगे बढ़ता जाएगा,
हो लक्ष्य भले दुष्कर कितना,
निश्चित पूरा हो जाएगा ।
जो गुजर चुके इन राहों से,
उनका इतिहास पुराना है,
अपना तो है लक्ष्य यही,
खुद का इतिहास रचाना है ।
हम उस माटी के वंशज हैं,
जिसमें जनमें हैं कर्मवीर,
जो सत्यमार्ग से डिगे नहीं,
तब ही कहलाये धर्मवीर ।
कहता सुधीर, न बनो अधीर,
जो होगा देखा जाएगा,
है कृष्णपक्ष जाना निश्चित,
तब शुक्ल पक्ष फिर आएगा ।
- सुधीर भारद्वाज
आपकी लेखनी गज़ब की प्रेरणा दायक है।नमन।
ReplyDeleteवाह कमाल की कविता है. शब्द संयोजन भाव को बहुत ही सुन्दर तरीके से व्यक्त कर रहा है. किसी निराश मन को आशा की किरण देने जैसा भाव है.
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