मन का संग्राम
मैं सदा प्यासी नदी हूँ प्यार की, रीत मुझको रोकती संसार की, कौन मन को बाँध पाया है कभी, मन के इस संग्राम में हारे सभी । आज हमने है छुआ जिसको पुलककर, दूर हो जाएगा वो पल में छिटककर, माझी बिना कैसे ये पहुंचे पार नैया, सलवटों के बोझ से बोझिल है शैया । मन के घट में है क्षुधा संचित हुई, प्यासे अधरों से सदा वंचित हुई, ज़िन्दगी की पाति कोने से फटी है, भाग्यरेखा है नहीं गहरी, कटी है । मुझको लगता है यदि संसार न होता, फिर किसी को भी किसी से प्यार न होता, क्या ये बंधन मन को कभी भी भायेगा, यह सुनिश्चित है कि जी भर जाएगा । मौन पीले पात सा झर जाएगा, जब हमारा मीत सम्मुख आएगा फिर खुलेंगे बंधन सभी संकोच के, आज हैं हर्षित बहुत ये सोच के।
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